मध्य प्रदेश में नर्मदा, चंबल, बेतवा और सोन नदियों पर बने विशाल बांधों के अथाह जलभंडार का उपयोग अब बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन के लिए होने जा रहा है। अब तक बांधों में केवल खुले पानी में नाव और जाल डालकर पारंपरिक मछली पकड़ी जाती थी, जिसमें मछुआरों को भारी मेहनत के बाद भी सीमित कमाई होती थी। इसी तस्वीर को बदलने और प्रदेश में नीली क्रांति को गति देने के लिए राज्य सरकार ने अपनी एकीकृत मत्स्योद्योग नीति लागू की है। इस नीति के तहत प्रदेश के बड़े जलाशयों में आधुनिक केज कल्चर यानी पानी में तैरते जालों के जरिए 1 लाख नए केज लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें मत्स्य पालकों को 60 प्रतिशत तक की सरकारी सब्सिडी दी जा रही है।
क्या है केज कल्चर और यह पारंपरिक खेती से क्यों बेहतर है?
केज कल्चर तकनीक में बांध या गहरे जलाशय के पानी में गैल्वेनाइज्ड लोहे या मजबूत पीवीसी पाइपों के तैरते हुए चौकोर ढांचे (फ्रेम) बनाए जाते हैं। इन ढांचों के नीचे 4 से 6 मीटर गहरा जाल पानी में लटका रहता है।
- सीमित जगह में बंपर उत्पादन: एक सामान्य आकार के केज (6x4x4 मीटर) से एक सीजन में लगभग 3 से 5 टन तक मछली (जैसे पंगेशियस या तिलापिया) का सुरक्षित उत्पादन लिया जा सकता है।
- शिकारी जीवों से बचाव: जाल के अंदर मछलियां बाहरी बड़ी मांसाहारी मछलियों, बगुले या ऊदबिलाव के शिकार से पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं।
- दाना खिलाने और देखरेख में आसानी: मछलियों को तैरता हुआ दाना (फ्लोटिंग फीड) दिया जाता है, जिससे उनकी बढ़वार तेजी से होती है और पानी भी गंदा नहीं होता।
सब्सिडी का पूरा गणित: किसको कितना अनुदान मिलेगा?
केज कल्चर की स्थापना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और राज्य की एकीकृत नीति के समन्वय से की जा रही है। इसमें केज निर्माण, जाल, फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म और शुरुआती बीज व दाने की लागत पर वर्गवार सब्सिडी दी जाती है:
| हितग्राही वर्ग | सब्सिडी का प्रतिशत | पात्रता व प्राथमिकता |
|---|---|---|
| महिलाएं, SC व ST वर्ग | लागत का 60% अनुदान | मछुआरा परिवार, महिला स्वयं सहायता समूह और जनजातीय मत्स्य पालक |
| सामान्य व पिछड़ा वर्ग (OBC) | लागत का 40% अनुदान | मत्स्य सहकारी समितियां, स्थानीय युवा और निजी उद्यमी |
10 साल का पट्टा और ‘उद्योग’ का दर्जा
पहले बांधों और जलाशयों में मछली पकड़ने के ठेके केवल 1 से 3 साल के लिए दिए जाते थे। कम समय होने की वजह से किसान या समितियां लाखों रुपये का ढांचा लगाने से कतराती थीं। नई नीति में सरकार ने दो ऐतिहासिक सुधार किए हैं:
- दीर्घकालिक पट्टा: केज कल्चर लगाने के लिए जलाशयों का जलक्षेत्र अब 10 वर्ष तक की अवधि के लिए लीज (पट्टे) पर दिया जाएगा, ताकि निवेशक और स्थानीय मछुआरे बिना किसी डर के पूंजी लगा सकें।
- उद्योग का दर्जा: मत्स्य पालन को कृषि के साथ-साथ एमएसएमई उद्योग का दर्जा दिया गया है। इससे कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट, फीड मिल और पैकेजिंग प्लांट लगाने पर सस्ती दरों पर बैंक लोन और बिजली सब्सिडी का लाभ मिल सकेगा।
किन-किन बड़े बांधों में लगेंगे 1 लाख केज?
प्रदेश के उन बड़े जलाशयों का चयन किया गया है जहां सालभर पानी का स्तर पर्याप्त रहता है और पानी की गुणवत्ता मछली पालन के अनुकूल है:
- खंडवा: इंदिरा सागर बांध एवं ओंकारेश्वर जलाशय
- जबलपुर: रानी अवंती बाई लोधी सागर (बरगी बांध)
- रीवा/शहडोल: बाणसागर जलाशय
- मंदसौर/नीमच: गांधी सागर बांध
- नर्मदापुरम: तवा जलाशय
- रायसेन: बारना जलाशय
आवेदन कैसे करें और कौन-से दस्तावेज जरूरी हैं?
केज कल्चर योजना का लाभ व्यक्तिगत रूप से, मछुआ सहकारी समिति या कंपनियों/समूहों के माध्यम से लिया जा सकता है:
- इच्छुक मत्स्य पालक और समितियां केंद्र सरकार के आधिकारिक प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना पोर्टल या मध्य प्रदेश सरकार के मत्स्योद्योग विभाग पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
- ऑफलाइन प्रक्रिया के लिए अपने जिले के कलेक्ट्रेट या मत्स्य विभाग के सहायक संचालक मत्स्योद्योग कार्यालय में संपर्क करके प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) जमा की जा सकती है।
जरूरी दस्तावेज: आधार कार्ड, मूल निवासी प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र (आरक्षित वर्ग व महिलाओं के लिए), बैंक पासबुक, यदि समिति है तो उसका पंजीयन प्रमाण पत्र और परियोजना का विस्तृत ब्यौरा।
