हर बुवाई सीजन में सोसायटियों और खाद की दुकानों पर डीएपी (DAP) और यूरिया के लिए किसानों की सबसे ज्यादा मारामारी रहती है। ज्यादातर किसान इन दोनों बोरियों को खेत में डालते जरूर हैं, लेकिन अक्सर जानकारी के अभाव में बड़ी गलतियां कर बैठते हैं। कई किसान तो खड़ी फसल में ऊपर से डीएपी फेंक देते हैं, जिससे खाद का एक बड़ा हिस्सा मिट्टी की ऊपरी परत पर ही सूखकर बेकार हो जाता है। अगर आप वैज्ञानिक तरीके से समझ लें कि डीएपी और यूरिया में क्या फर्क है और पौधे को इनकी जरूरत कब और कैसे होती है, तो खाद की लागत में 25 से 30 प्रतिशत की बचत के साथ पैदावार में सीधा इजाफा हो सकता है।
दोनों खादों में क्या अंतर है? (तत्वों का असली गणित)
बाजार में मिलने वाली दोनों खादों का काम, रासायनिक संगठन और पौधों पर असर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है:
| मापदंड | डीएपी (DAP) खाद | यूरिया (Urea) खाद |
|---|---|---|
| मुख्य पोषक तत्व | 18% नाइट्रोजन + 46% फास्फोरस | 46% शुद्ध नाइट्रोजन |
| पौधे में मुख्य काम | जड़ों का गहरा फैलाव, तने को मजबूती और फुटाव | पत्तियों में हरापन (क्लोरोफिल) और पौधे की बढ़वार |
| डालने का सही समय | केवल बुवाई के समय (जमीन के अंदर बीज के नीचे) | खड़ी फसल में सिंचाई के बाद 2 से 3 टुकड़ों में |
| मिट्टी में गतिशीलता | अचल (Immobile) – जहां गिरेगी वहीं रहेगी | अत्यधिक गतिशील (पानी के साथ तेजी से रिसती है) |
डीएपी को खड़ी फसल में ऊपर से कभी क्यों नहीं फेंकना चाहिए?
यह किसानों द्वारा की जाने वाली सबसे आम और महंगी गलती है। डीएपी में मुख्य तत्व फास्फोरस होता है, जो पानी में डालने पर यूरिया की तरह खुद-ब-खुद जमीन में नीचे नहीं रिसता। फास्फोरस मिट्टी में जहां पड़ता है, वहीं स्थिर हो जाता है।
यदि आप खड़ी फसल में डीएपी ऊपर से बखेरेंगे, तो वह मिट्टी की ऊपरी सूखी सतह पर ही जम जाएगा और नीचे गहराई में मौजूद जड़ों तक कभी नहीं पहुंच पाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार डीएपी का पूरा फायदा तभी मिलता है जब इसे सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल के जरिए बुवाई के समय बीज से 4 से 5 सेंटीमीटर नीचे मिट्टी में दबाया जाए।
यूरिया डालने का सही वैज्ञानिक तरीका और समय
यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन एमाइड रूप में होती है, जो जमीन में नमी पाते ही तेजी से अमोनियम और फिर नाइट्रेट में बदल जाती है। पौधे इसे बहुत जल्दी सोखते हैं।
- एकमुश्त कभी न डालें: यदि आप पूरी यूरिया बुवाई या पहली सिंचाई पर एक साथ डाल देंगे, तो आधी से ज्यादा नाइट्रोजन या तो गैस बनकर हवा में उड़ जाएगी या फिर पानी के साथ जमीन के बहुत नीचे बह जाएगी।
- टुकड़ों में दें (स्प्लिट डोज): फसल की जरूरत के हिसाब से यूरिया को तीन भागों में बांटें। पहली खुराक पहली सिंचाई पर, दूसरी कल्ले या शाखाएं निकलते समय (बुवाई के 30-35 दिन बाद), और तीसरी खुराक फूल आने से पहले दें।
- ज्यादा यूरिया का नुकसान: जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से पौधा बेवजह लंबा होकर कमजोर हो जाता है, जिससे तेज हवा या बारिश में फसल गिर (लॉजिंग) जाती है और रसचूसक कीटों व फंगस का प्रकोप बढ़ जाता है।
डीएपी और जिंक सल्फेट को एक साथ मिलाने की भारी भूल
कई किसान मेहनत और समय बचाने के चक्कर में बुवाई के समय डीएपी और जिंक सल्फेट को आपस में मिलाकर खेत में डाल देते हैं। यह भारी नुकसान का सौदा है।
रसायन विज्ञान के नियम के मुताबिक जब डीएपी का फास्फेट और जिंक आपस में मिलते हैं, तो वे एक नया यौगिक ‘जिंक फॉस्फेट’ बना लेते हैं। यह पत्थर जैसा अघुलनशील रूप होता है जिसे पौधा कभी अपनी जड़ों से नहीं चूस पाता। नतीजा यह होता है कि दोनों महंगी खादें खेत में रहते हुए भी मिट्टी में बेकार हो जाती हैं। जिंक हमेशा अलग से जमीन की तैयारी के समय डालें या डीएपी देने के 20 से 25 दिन बाद खड़ी फसल में दें।
संतुलित खाद प्रबंधन के लिए जरूरी सलाह
अंधाधुंध रासायनिक खाद डालने से मिट्टी का जैविक कार्बन कम होता है और खेत की उर्वरा शक्ति घटती है। हर किसान को फसल बोने से पहले अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या मृदा स्वास्थ्य कार्ड पोर्टल के जरिए मिट्टी की जांच जरूर करवानी चाहिए, ताकि खेत में केवल उसी तत्व की खाद डाली जाए जिसकी जमीन में असली कमी है।
